तीसरा इल्ज़ाम ईरान पर यमन को अस्थिर करने का है. ईरान यमन में हूती विद्रोहियों को मदद पहुंचा रहा है और पश्चिमी यमन में इसका नियंत्रण है.
लेकिन यमन में भी ईरान की संलिप्तता अकारण नहीं है.
सीरिया में सऊदी
अरब चाहता था कि वो ईरान समर्थक सरकार को उखाड़ फेंके. यमन में हूती विद्रोहियों ने सऊदी समर्थक राष्ट्रपति अब्द्राब्बुह मंसुर हादी को उखाड़
फेंका था.
ईरान को मंसुर का यमन की सत्ता से जाना रासा आया था. ईरान यमन को सऊदी के वियतनाम के तौर पर देखता है. रियाद के साथ संयुक्त अरब
अमीरात ने यमन के बंदगाहों को बंद कर दिया और लोगों पर बम भी बरसाए. आज की
तारीख़ में यमन दुनिया के सबसे ख़तरनाक मानवीय संकट से जूझ रहा है.
ईरान
पर आख़िरी इल्ज़ाम अमरीका यह लगाता है कि वो राज्य प्रायोजित आतंकवाद को
बढ़ावा दे रहा है. ज़ाहिर है ईरान से हिज़्बुल्लाह, फ़लस्तीनी इस्लामिक जिहाद और हमास को मदद मिलती है.
हालांकि इन्हें अमरीका के सहयोगी क़तर और तुर्की से भी मदद मिलती है. कहा जाता है कि बेरूत में 1983 में
अमरीकी दूतावास पर जो हमला हुआ था उसमें हिज़्बुल्लाह का हाथ था. इसके साथ ही सऊदी अरब में 1996 में अमरीकी वायु सेना के एक कॉम्पेलक्स पर हमला हुआ
था और इसके लिए भी इन्हीं संगठनों पर आरोप लगे थे.
लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि सुन्नी जिहादी समूह जैसे- आईएसआईएस और अल क़ायदा ने ज़्यादा अमरीकी नागरिकों की हत्या है और इन्हें भारी मदद ईरान
से नहीं बल्कि सुन्नी नेतृत्व वाले देश और ख़ास कर सऊदी अरब से मिल रही
है.
2016 में अमरीका में 9/11 के हमले की जांच रिपोर्ट के कई ऐसे
तथ्य सामने आए थे जिसमें कहा गया था कि विमान हाइजैकर्स को उन लोगों से मदद मिली जो शायद सऊदी सरकार के संपर्क में थे. सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार
इस साल की शुरुआत में सऊदी और यूएई ने यमन में अल क़ायदा को अमरीका में बने हथियार मुहैया कराए हैं.
2014 में पेंटागन की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि ईरान की सैन्य रणनीति में आत्मसुरक्षा केंद्र में है. अमरीका और
इसराइल के कई विशेषज्ञों का यह आकलन रहा है कि ईरान अपनी सुरक्षा को लेकर सतर्क रहता है न कि किसी पर हमला करने की आकांक्षा रखता है.
1953
में अमरीका और ब्रिटेन ने ईरान में लोकतांत्रिक तरीक़े से चुने गए
प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग को अपदस्थ कर पहलवी को सत्ता सौंप दी थी. मोहम्मद मोसादेग ने ही ईरान के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया था और वो चाहते थे कि शाह की शक्ति कम हो.
किसी विदेशी नेता को शांतिपूर्ण वक़्त में अपदस्थ करने का काम अमरीका ने पहली बार ईरान में किया. लेकिन यह आख़िरी नहीं था. इसके बाद अमरीका की विदेश नीति का यह एक तरह से हिस्सा बन गया.
1953 में ईरान में अमरीका ने जिस तरह से तख्तापलट किया उसी का नतीजा 1979 की ईरानी क्रांति थी. इन
40 सालों में ईरान और पश्चिम के बीच कड़वाहट ख़त्म नहीं हुई.
अब
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप कह रहे हैं कि अगर ईरान युद्ध में गया तो
उसका अस्तित्व मिट जाएगा. लेकिन अमरीका को भी युद्ध के ख़तरों का अंदाज़ा है क्योंकि 2003 में वो इराक़ में सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाने के लिए
ऐसा कर चुका है.
इस्लामिक क्रांति के 40 सालों बाद ईरान ने कई संकट
देखे हैं लेकिन इस बार का ख़तरा काफ़ी गंभीर है. कई विशेषज्ञ मानते हैं कि
ईरान अगर झुकता है तब भी हारेगा और लड़ता है तब भी जीत नहीं मिलेगी.
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