ल 2014 में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह यहां रैली करने आए थे.
जब हम
जावेद कादरी के घर पर पहुंचे तो उनको घर में कैद हुए 15 दिन बीत चुके थे और
उनके साथ हरियाणा से आए एक व्यापारी बैठे थे. जावेद क़ादरी के सेब के
बागान हैं.
पहाड़ी पर एक ऊंचे टीले पर बना उनका मकान एक क़िले जैसा है.
घर
के बाहर बख़्तरबंद गाड़ियों के साथ सुरक्षाकर्मी तो थे ही, अंदर भी बंकर के पीछे सुरक्षाकर्मी मौजूद थे. उनका हाल-चाल जानने बंदूक लिए वरिष्ठ
सुरक्षा अधिकारी उनके घर पर पहुंचे थे.
इतनी सुरक्षा बंदोबस्त के बावजूद उन पर दो हमले हो चुके हैं. साल के जावेद क़ादरी एक हमले को याद करते हैं, "रात करीब 12 बजे का वक्त
था जब बाहर से फ़ायरिंग हुई. हम अंदर बैठे थे. हमारी सिक्योरिटी ने हमारी
हिफ़ाज़त की. ये नहीं कह सकते कि किसने किया. हम अंदर थे, हम क्या
बताएंगे."
सरपंच रहे जावेद क़ादरी साल 2014 में भाजपा में शामिल हुए.
वो
कहते हैं, "मोदी जी को देखकर हम भाजपा में शामिल हुए थे… उस वक्त ये बात
हुई कि अगर बीजेपी की सरकार आई तो मुसलमानों के साथ ये होगा वो होगा. एक
बार हम बीजेपी दिल्ली दफ़्तर गए थे. हमने ऑफ़िस में नमाज़ अदा की थी… इस
सरकार में मुसलमान सबसे सुरक्षित हैं."
जावेद क़ादरी के मुताबिक ख़तरों के बावजूद शोपियां में रहने का कारण है कि वो अपने वोटरों के नज़दीक रहना चाहते हैं.
जावेद
कहते हैं, "आज भी मेरा बच्चा नींद में आवाज़ देता है, डर तो है. अगर अब हम
काम नहीं करेंगे तो कौन करेगा... हम कभी सोते भी नहीं. हम हिंदुस्तानी
हैं, हम हिंदुस्तान से प्यार करते हैं. ये हक़ीक़त बात है... हमेशा अलर्ट
पर रहते हैं एक सिपाही की तरह..."मेरे घरवाले, मेरी बीवी रिश्तेदार कहते हैं कि आप श्रीनगर चले जाओ,
लेकिन मैं घरवालों को भी बोलता हूं कि इतनी कम उम्र में लोगों ने मुझे इतने
वोट दिए, मैं लोगों को धोखा नहीं दे सकता हूं, न दूंगा, और न निकलूंगा घर
से, और तो और मौत तो ऊपर वाले के हाथ में है."
जावेद क़ादरी की शिकायत है कि उनके पास सुरक्षा की कमी है.
जावेद
कहते हैं, "हमारे पास भी बुलेट प्रूफ़ गाड़ी होनी चाहिए क्योंकि हम
शोपियां में बैठते हैं. मैं लोगों की शादियों में जाता हूं, कोई मर जाता है
तो लोगों के घर जाता हूं. लेकिन बदकिस्मती से हमें वो सिक्योरिटी नहीं
मिलती जो उन लोगों को मिलती है जो श्रीनगर और जम्मू में बैठे हैं."
जम्मू-कश्मीर में भाजपा महासचिव (संगठन) अशोक कौल को सुरक्षा का भरोसा दिलाते है.
उन्होंने
बीबीसी को बताया, "पार्टी के कार्यकर्ताओं को थोड़ी बहुत सुरक्षा दी है
सरकार ने. जिनको नहीं दी है उनके लिए भी हम सुरक्षा मांग रहे हैं. सिर्फ़
सुरक्षा से नहीं होगा, उसके बाद होता है कि उनके रहने की व्यवस्था हो जाए,
उन्हें कहीं सुरक्षित जगह रखा जाए, उसकी हम चर्चा कर रहे हैं.. सरकार ने
हमें आश्वस्त किया है कि हम पार्टी के कार्यकर्ताओं की सुरक्षा करेंगे."
"हमने
तीन-चार जगह सुरक्षित घर लिए हैं, उन घरों में उन्हें रखा है.... जहां ये
संभव नहीं है वहां हमने लोगों को सरकारी घरों में रखा है. अपने
कार्यकर्ताओं के लिए हम और घर मांग रहे हैं."
लेकिन 1993 से भाजपा से जुड़े और भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने के अलावा
वरिष्ठ पदों पर रह चुके शौकत हुसैन वानी अशोक कौल से सहमत नहीं.
वो सालों से अनंतनाग का अपना घर छोड़कर श्रीनगर में 20,000 रुपए महीना किराए के मकान में रह रहे हैं.
वो
कहते हैं, "2002 के बाद न हमें सरकारी घर मिला, न हमें सुरक्षा मिली, मेरे
साथ एक पीएसओ है जो नाकाफ़ी है. हर दो महीने, चार महीने में हमें घर बदलना
पड़ता है, मकान मालिक से हम कुछ बोल नहीं सकते हैं नहीं तो हमें किराए पर
घर भी नहीं मिलेगा...महंगाई के कारण हम शहर में अपना घर भी नहीं बना सकते.
इतनी भी ताकत नहीं है. मैंने जितना किया अपने दम पर किया.... लीडरशिप से
कभी मदद नहीं मांगी."
जब शौकत पार्टी में शामिल हुए तो उनकी उम्र 27-28 की थी.
वो
याद करते हैं, "उस वक्त अटल जी के साथ हमारी मुलाकात हुई, हालांकि पार्टी
प्रमुख तो आडवाणी जी थे. उस वक्त पार्टी के पास कुछ विज़नरी लीडर्स थे.
बंगारू लक्ष्मण, केएस साहनी जी थे. कुशाभाऊ ठाकरे जी थे. उनसे जब हमारी
मुलाकात हुई तो मेरा विज़न और खुल गया."
उनके फ़ैसले पर उनका परिवार इतना नाराज़ हुआ कि महीनों तक वो साथ नहीं रह पाए.
लेकिन इतने सालों बाद आज शौकत बेहत आहत नज़र आते हैं.
वो कहते हैं कि जिस पार्टी के लिए उन्होंने इतना कुछ सहा, बेहद असुरक्षा
के माहौल में पार्टी के लिए प्रचार किया, उसे उनकी सुरक्षा की कोई परवाह
नहीं. शौकत के मुताबिक वो अपनी चिंताओं से पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को
वाकिफ़ करवाते रहे हैं.
पार्टी कार्यकर्ताओं से बात करें तो पता चलेगा कि बीफ़ और बाबरी मस्जिद
जैसे विवादास्पद मुद्दों पर भाजपा नेताओं के स्टैंड और बयानों से कश्मीर
में आम लोगों के बीच उनकी मुश्किलें आसान नहीं होतीं.
उधर पुलवामा में भाजपा कार्यकर्ता शब्बीर भट्ट की मौत के बाद दूसरे भाई नौकरी की तलाश कर रहे हैं.
शब्बीर के भाई ज़हूरुल इस्लाम भट्ट बताते हैं कि उनका बड़ा भाई पीएचडी करके बैठा हुआ है और उन्हें नौकरी की ज़रूरत है.
वो कहते हैं, "हमारी ऐसी इनकम नहीं है. हम गांव के लोग हैं… हमारे घर में कोई नौकरी करने वाला नहीं है. खेती बाड़ी से चलता है."
श्रीनगर
में पार्टी के एक पदाधिकारी ने मुझे परिवार की ओर से भेजी गई डिग्रियां और दस्तावेज़ दिखाते हुए बताया कि वो कई दिनों से वरिष्ठ नेताओं से शब्बीर
भट्ट के परिवार के एक सदस्य को नौकरी दिलवाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन उसका कोई नतीजा नहीं निकला है.